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संग्रह से : हिन्दी में लेटरफॉर्म आर्काइव का परिचय

अक्षरों के इतिहास और डिज़ाइन की कहानियाँ, अब हिन्दी में। / An introduction in Hindi to Letterform Archive’s collection.

यह लेटरफॉर्म आर्काइव पर प्रकाशित होने वाला पहला हिंदी लेख है। इसमें दुनिया भर से आई वस्तुएँ शामिल हैं, और यह लेख उनके कुछ चुने हुए उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसे लिखने का उद्देश्य सिर्फ़ नए पाठकों तक पहुँचना नहीं है, बल्कि रॉडिकल एक्सेस के विचार को आगे बढ़ाना है, जिस पर लेटरफॉर्म आर्काइव की नींव रखी गई है।

As Letterform Archive’s first post published in a language other than English, this article — the transcription of an online tour by Mumbai-based docent Tanya George — introduces the Archive to a Hindi readership. It’s part of our aim to welcome a broader global community, in keeping with our commitment to radical access. Don’t read Hindi? We invite you to translate this page into a language you know, as many readers have done in the past with our content. We look forward to sharing more from our international, multilingual docent team and other contributors.

रॉडिकल एक्सेस का अर्थ है व्यापक पहुँच। लेटरफॉर्म आर्काइव का मानना है कि डिज़ाइन और टाइपोग्राफ़ी का ज्ञान कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसकी संग्रह सामग्री, शोध और कहानियाँ दुनिया भर के लोगों के लिए खुली और सुलभ हों, यही इसका मूल लक्ष्य है। हिंदी में लेख प्रकाशित करना उसी दिशा में एक छोटा लेकिन महत्त्वपूर्ण कदम है। भारत में करोड़ों लोग हिंदी पढ़ते और लिखते हैं, फिर भी टाइपोग्राफ़ी और डिज़ाइन पर ऑनलाइन बहुत कम सामग्री उपलब्ध है। यह हिंदी लेख उस कमी को थोड़ा भरने की कोशिश है, ताकि और अधिक लोग अक्षरों, लेखन प्रणालियों और दृश्य संचार के इतिहास को अपनी भाषा में पढ़ और समझ सकें। इस पहल के माध्यम से लेटरफॉर्म आर्काइव अपने संग्रह और विचारों को एक व्यापक, बहुभाषी समुदाय के साथ साझा करना चाहता है, क्योंकि अक्षरों की दुनिया तब और समृद्ध होती है जब वह सभी के लिए खुली हो।

लेटरफॉर्म आर्काइव एक स्वतंत्र विशेष संग्रहालय पुस्तकालय है, जिसकी स्थापना २०१५ में हुई थी। यह संचार के इतिहास को संरक्षित करता है और विशेष रूप से लिखित रूपों पर केंद्रित है, विभिन्न समयों और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से।

आर्काइव में दुनिया भर से एक विशाल संग्रह मौजूद है। यह लेख उसी व्यापक संग्रह में से चुनी गई कुछ वस्तुओं का एक प्रारंभिक परिचय प्रस्तुत करता है। इनमें से कुछ वस्तुएँ भारत से जुड़ी हैं, जबकि कई, विभिन्न देशों से आती हैं और अलग-अलग लेखन प्रणालियों, विचारों और डिज़ाइन परंपराओं को सामने लाती हैं। इन उदाहरणों के माध्यम से यह प्रयास है कि भाषाओं और लिपियों के पार मौजूद बड़े संबंधों को देखा और समझा जा सके, और अक्षरों की दुनिया को एक जुड़ी हुई, संयुक्त विरासत के रूप में पढ़ा जा सके।

क्यूनिफ़ॉर्म टैबलेट

शुरुआत हम लगभग ईसा-पूर्व दूसरी सहस्राब्दी से करते हैं, एक क्यूनिफ़ॉर्म टैबलेट के साथ। क़रीब चार हज़ार साल पुरानी यह क्यूनिफ़ॉर्म टैबलेट आर्काइव की अब तक की सबसे प्राचीन वस्तु है। यह मेसोपोटेमिया में लगभग २००० बि. सी. ई. के आसपास बनाया गया था। पहली नज़र में यह सख्त मिट्टी का एक खुरदुरा-सा टुकड़ा लगता है, इतना छोटा कि आपकी हथेली में आराम से आ जाए।

लेकिन ज़रा करीब से देखें तो इसकी सतह पर नुकीले-नुकीले निशान दिखाई देते हैं। ये निशान दुनिया की पहली पूर्ण लेखन प्रणाली मानी-जाने वाली लिपि के चिन्ह हैं। इसे लिखने के लिए, एक लेखक गीली मिट्टी को एक सपाट आकार देता था और एक सरकंडी की कलम से बने नोक से दबाता था। इससे तीर और पंचाकार जैसे नियमित निशान बनते थे, जो प्रकाश और परछाइयों के साथ अलग-अलग रंग और गहराई लेते हुए दिखाई देते थे।

अन्य शोधकर्ताओं से हमें पता चलता है कि यह पाठ अक्कादियन भाषा में लिखा गया है। यह पाठ बाएँ से दाएँ पढ़ा जाता है, और वाक्यों को क्षैतिज रेखाओं से अलग किया गया है। “पन्ना पलटने” के लिए इस टैबलेट को नीचे वाले किनारे से ऊपर की ओर पलटना होता है। यह एक छोटे-से समूह द्वारा किए गए बुनियादी श्रम का लिखित रिकॉर्ड है,
और इसके बारें में विस्तार में आप लेटरफॉर्म आर्काइव के ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं।

पाम लीफ पांडुलिपि

हमारे अगले वस्तु के लिए हम कुछ सदियों पार, मध्यकालीन दौर में आते हैं और मेसोपोटामिया से केरल पहुँचते हैं। यहां हम मलयालम लिपि में लिखी एक पाम लीफ मॅनुस्क्रिप्ट, यानी ताड़ के पत्ते की पांडुलिपि को गौर से देखते हैं।

भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट से प्राप्त मलयालम में लिखी मध्यकालीन ज्योतिषीय पांडुलिपि।
भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट से प्राप्त मलयालम में लिखी मध्यकालीन ज्योतिषीय पांडुलिपि।

पाम लीफ पांडुलिपियों में अक्षर लिखने का तरीक़ा बहुत दिलचस्प था। पत्तों को आयताकार में काटने और सुखाने के बाद, एक नुकीली नोक से अक्षर उकेरे जाते थे। इसके बाद काले स्याही के इस्तेमाल से उन खांचों को रंगा जाता था, और फिर ऊपर से पोंछा जाता था, जिससे स्याही केवल उकेरे गए निशानों में ही रहती थी।आम तौर पर, हर पन्ने में एक छेद होता था, जिससे एक डोरी निकाली जाती थी और इन पन्नों को एक साथ बाँधकर एक किताब की तरह तैयार किया जाता था।

कैलिग्राफी कार्यशाला के दौरान आर. के. जोशी। चित्र सौजन्य: विनय सयनेकर।
कैलीग्राफ़ी कार्यशाला के दौरान आर. के. जोशी। चित्र सौजन्य: विनय सयनेकर।

इस नमूने को ख़ास बनाता है कि यह असली पांडुलिपि नहीं, बल्कि उसका ज़ेरॉक्स कॉपी है।यह पृष्ठ भारतीय सुलेख डायरी से लिया गया है, जो चिमनलाल कंपनी की १९८० की वार्षिक डायरी थी। इस नोटबुक को खूबसूरती से कंपनी के क्रिएटिव डायरेक्टर  र.के.जोशी ने डिज़ाइन किया था।

रघुनाथ कृष्ण जोशी (१९३६-२००८), जिन्हें र.के. जोशी के नाम से जाना जाता है, डिज़ाइन, टाइपोग्राफी, कविता और सुलेख की दुनिया में अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे। भारतीय लिपियों के लिए टाइप डिज़ाइन में उनका योगदान और भारतीय भाषाओं तथा टाइपोग्राफ़ी को आगे बढ़ाने की उनकी लगन का गहरा असर रहा है। इसी तरह डायरी के भीतर एक रोचक चार्ट व्यंजन ‘’ के २३०० वर्षों के विकास को दर्शाता है, और अंततः एक बहु-भाषा चार्ट में भारत में प्रचलित १५ भाषाओं और उनकी लिपियों को दिखाया गया है। जोशी ने इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए एक संयुक्त लिपि “देशनागरी” का भी प्रस्ताव रखा, जिसका उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं के लिए एक लेखन प्रणाली विकसित करना था, हालांकि यह एक सैद्धांतिक विचार ही रहा।

आप आर. के. जोशी और उनके काम के बारे में इस ब्लॉग पोस्ट में और पढ़ सकते हैं।

Reverse side of label from the Indian Calligraphy Diary, designed by R.K. Joshi for Chimmanlal paper company. It reuses the design from the inside cover featuring the vowel marks with the “a” sound from different Indian scripts.
लेबल का पिछला हिस्सा, जिसमें अंदरूनी कवर के डिज़ाइन का फिर से उपयोग किया गया है। इसमें विभिन्न भारतीय लिपियों में स्वर “अ” को दिखाया गया है।

इथियोपियाई पांडुलिपि

अब हम अरबी सागर पार करके इथियोपिया की ओर बढ़ते हैं और एक इथियोपियाई पांडुलिपि देखते हैं। यह पांडुलिपि जानवर की खाल से बना वेल्लम (vellum) पर, हाथ से लिखी गई है और इसका इस्तेमाल ईसाई मिशनरियों द्वारा किया जाता था। इसे हाथ से तैयार किए गए, भूरे रंग के चमड़े के कवर में बांधा गया है, जिसमें कॉप्टिक बाइंडिंग(coptic binding) का प्रयोग हुआ है, जो कि बाइबिल की प्राचीन शैली की एक बाँधने की विधि है, जिसमें पन्नों को काटकर सीधे सिलाई से जोड़ा जाता था।

मिशनरियों द्वारा उपयोग की गई चर्मपत्र पर लिखी एक इथियोपियाई पांडुलिपि।

यह पांडुलिपि गी’एज़ (Ge’ez) लिपि में लिखी गई है।यह एक प्राचीन इथियोपियाई लेखन प्रणाली जो अब प्रमुख रूप से धार्मिक और समारोहिक प्रयोजनों के लिए उपयोग की जाती है। गी’एज़ लिपि में अक्षर एक सिलैब्री रूप में होते हैं, जहाँ प्रत्येक चिन्ह एक व्यंजन-स्वर संयोजन को दर्शाता है।

यह पांडुलिपि सत्रह सौ के आसपास बनी थी, लेकिन ऐसा लगता है कि इसमें अभी हाल ही में, नीली स्याही वाले पेन से कुछ नए जोड़ भी किए गए हैं। एक और दिलचस्प बात यह है कि पांडुलिपि के ज़्यादातर पन्नों पर एक ही कॉलम रखा गया है, लेकिन अंत की ओर आते-आते हर पन्ने पर दो कॉलम बना दिए गए हैं, शायद यह महसूस करते हुए कि जगह कम पड़ रही थी।

गुजराती टाइप फाउंड्री

अब हम अरबी सागर पार करके मायानगरी बॉम्बे (अब मुंबई) लौटते हैं और गुजराती टाइप फाउंड्री की कहानी देखते हैं। यह भारत में प्रमुख टाइप फ़ाउंड्रियों में से एक थी, जिसकी स्थापना गिरगांव में १९०० में इचाराम सुर्याराम देसाई और मगनलाल थाकोरदास मोदी ने की थी। टाइप फ़ाउंड्रियों एक ऐसी संस्था हैं, जहाँ मुद्रण के लिए अलग अलग डिज़ाइन के फ़ोंट्स बनते हैं। गुजराती टाइप फाउंड्री के डिज़ाइंस लेटरप्रेस प्रिंटिंग (Letterpress Printing ) में इस्तेमाल किया जाता था। यह भारत में प्रमुख मेटल टाइप (Metal Type) बनाने वाली संस्थाओं में से एक थी।

हिंदी और गुजराती अक्षरों को सेट करने के लिए उपयोग किए गए नी-पो (Ne-Po) सॉर्ट्स, जिनका प्रयोग भारतीय प्रिंटरों के लिए विज्ञापन में किया गया था।
गुजराती टाइप फ़ाउंड्री की स्पेसिमेन बुक से, लगभग १९४० के दशक।
हिंदी और गुजराती अक्षरों को सेट करने के लिए उपयोग किए गए नी-पो (Ne-Po) सॉर्ट्स, जिनका प्रयोग भारतीय प्रिंटरों के लिए विज्ञापन में किया गया था। गुजराती टाइप फ़ाउंड्री की स्पेसिमेन बुक से, लगभग १९४० के दशक।

इस फाउंड्री ने, न केवल गुजराती और देवनागरी लिपियों के लिए मेटल टाइप तैयार किए, बल्कि मराठी, उर्दू, सिंधी, कन्नड़ और गुरुमुखी लिपियों के लिए भी टाइप विकसित किए। इसके टाइप स्पेसिमेन कैटलॉग में इसके समय के कई डिज़ाइन शामिल हैं — अलग-अलग लिपियों और आकारों में टाइप, सजावटी ऑर्नामेंट्स तथा बोरडर्स भी दिखाए गए हैं।

लेटरफॉर्म आर्काइव में मौजूद दो बंधे हुए कैटलॉग इस फाउंड्री की व्यापक उत्पादन क्षमता और विभिन्‍न लिपियों के टाइप डिज़ाइनों को प्रदर्शित करते हैं। इन कैटलॉगों में ऐसी कई मेटल टाइप डिज़ाइन के उधारण हैं जो भारत में उस समय के मुद्रण उद्योग की प्रगति को दर्शाती हैं।

इन स्पेसिमेन बुक में देवनागरी लिपि के लिए अलग-अलग आकारों में कई डिज़ाइन देखने को मिलते हैं। फ़ाउंड्री के इश्तहारी लेख में यह दावा किया गया है कि देवनागरी की पहली इटैलिक शैली का श्रेय इन्हीं को जाता है।

भारतीय मुद्रण विद्वान बापूराव एस. नाइक भी गुजराती टाइप फाउंड्री को यह श्रेय देते हैं कि, उन्होंने देवनागरी और गुजराती में दाहिनी ओर झुकी हुई इटैलिक शैलियाँ प्रस्तुत कीं। इन पुस्तकों के माध्यम से इन लिपियों के लिए शेडेड डिज़ाइन भी पहली बार प्रस्तुत किए गए। नारायण सोनू, अनंत चारी और अनंत सालास्कर जैसे कई प्रमुख पंचकटर्स इस फ़ाउंड्री में काम करते थे, और फ़ाउंड्री के अधिकांश काम का श्रेय इन्हीं को दिया जाता है।

फ़ाउंड्री के बारे में और जानें, और यह भी कि उन्होंने दुनिया भर से अपने टाइप कैसे प्राप्त किए। इसके पन्ने आप ऑनलाइन आर्काइव पर भी देखे सकते हैं ।

इंडियन फ़िल्म पोस्टर

भारत की सड़कों पर फ़िल्म पोस्टर का इतिहास रंगीन और बहुभाषिक रहा है।१९२० से लेकर १९८० तक भारत की सड़कों पर हाथ से बनाए गए फ़िल्म पोस्टरों का राज था। ये बड़े-बड़े बैनर कपड़े या सस्ते काग़ज़ पर बनाए जाते थे और शहरों के होर्डिंग से लेकर गाँव की दीवारों तक चमकते दिखाई देते थे। देश में कई भाषाएँ बोली जाती थीं और पढ़ने-लिखने के स्तर भी अलग-अलग थे, इसलिए पोस्टरों में लिखावट बहुत कम रखी जाती थी। आमतौर पर केवल नाम और क्रेडिट ही लिखे जाते थे। डिज़ाइन में ज़्यादा ध्यान कलाकारों के भाव और दृश्यों पर दिया जाता था, ताकि एक नज़र में फ़िल्म का माहौल समझ आ जाए।

हर पोस्टर किसी तरह फ़िल्म के ट्रेलर जैसा होता था। यहाँ देखते ही, फ़िल्म का प्रकार, उसका माहौल और उसके किरदार समझ में आ जाते थे। जहाँ लिखित माध्यम कम पहुँच पाता था, वहाँ ये चित्र सिनेमा और दर्शकों के बीच एक पुल का काम करते थे, जिन्हें देखकर हर कोई बात समझ सकता था। लेटरफॉर्म आर्काइव की भारतीय फ़िल्म पोस्टर संग्रह में कई दशकों के पोस्टरों शामिल हैं जो, बंगाली, देवनागरी, उर्दू, तेलुगु और अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं में अर्थपूर्ण लेटरिंग दिखाते हैं। इन पोस्टरों ने फिल्म के शीर्षक को चित्रात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए अलग-अलग अक्षरशैली अपनाई, और भाषा की विविधता को सामने रखा। यह संग्रह भारतीय फ़िल्म उद्योग में अक्षरों की बनावट और चित्रात्मक शैली की विविधता को दर्शाता है।

यहाँ तीन पोस्टरों पर विशेष ध्यान दिया गया है, लेकिन देखने के लिए और भी कई पोस्टर ब्लॉग पर मौजूद हैं

शमशीर बाज़ (१९५३) के पोस्टर पर शीर्षक तीन लिपियों में लिखा है—देवनागरी, नस्तालिक और लैटिन। यह बंबई में लिथोग्राफ़िक प्रिंट के रूप में छापा गया था। इसी वजह से इसका चंचल लेआउट बन पाया और देवनागरी शीर्षक की शिरोरेखा को मोड़कर लगाया गया।फ़िल्म की नायिका फीयरलेस नादीया को पोस्टर पे सबसे ज़्यादा जगह दिया हैं, और यह चित्र उनकी बहादुरी और ताक़त को स्पष्ट रूप से दिखाते हैं।

शिमाबद्धो (१९७१) एक बांग्ला फ़िल्म का पोस्टर है, जिसे फ़िल्म के निर्देशक सत्यजीत राय ने डिज़ाइन भी किया। शिमाबद्धो का अर्थ है सीमाएँ या बंधन। इस विचार को दिखाने के लिए राय ने शीर्षक की बांग्ला (ী) बड़ी ई की मात्रा घुमावदार बनाई, जिसे जानबूझकर पोस्टर के किनारों से काट दिया गया है, ताकि वह सीमाओं में फँसी हुई लगे। यहाँ भी राय पोस्टर को तीन हिस्सों में बाँटते हैं, और काली पट्टियाँ ऐसी लगती हैं जैसे वे पात्रों को बाँध रही हों, जो फ़िल्म के विषय को भी दिखाती हैं।

तेज़ और चमकीले रंगों के साथ कलाकारों की तस्वीरों के कटआउट, जो राय की पसंदीदा डिज़ाइन तकनीकों में से थे और जिन्हें उन्होंने कई अन्य पोस्टरों में भी इस्तेमाल किया, मिलकर इस पोस्टर को आधुनिक रूप देते हैं। उस समय आम तौर पर सिर्फ़ दो रंगों के प्रिंट होते थे, इसलिए यह पोस्टर तुरंत ध्यान आकर्षित करता था।

एदुरुलेनि मोनगल्लु (१९८४) एक तेलुगु फ़िल्म का पोस्टर है। इसका चित्रांकन बी. एन. कृष्णा ने किया था और प्रचार डिज़ाइन एस. वी. चलपति राव ने बनाया था। तस्वीरों के कटआउट के साथ शीर्षक में मज़बूत थ्री-डी प्रभाव भी है, जो उस समय काफ़ी प्रचलित था। शीर्षक का रूप सजावटी है, लेकिन तेलुगु लिपि को बहुत ध्यान से इस्तेमाल किया गया है, जो केवल वही डिज़ाइनर कर सकता है जो इस लिपि से अच्छी तरह परिचित हो।

मैं स्वयं तेलुगु पढ़ने वाली नहीं हूँ, इसलिए मैंने तेलुगु बोलने वाली टाइप डिज़ाइनर और शोधकर्ता वैष्णवी मूर्ति से इसके बारे में बात की। उन्हें विशेष रूप से दूसरे शब्द के पहले और आख़िरी (మొ और ళ్ళు)अक्षर, और उनमें बने वट्टु अक्षरों का डिज़ाइन बहुत प्रभावशाली लगा।

वुड टाइप

वुड टाइप मुद्रण के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जिसका खास तौर पर १९ शताब्दी के पोस्टरों और विज्ञापनों में इस्तेमाल होता था। जब लिखावट को बड़ा, मोटा और दूर से पढ़ने लायक बनाना होता था, तब धातु के टाइप की तुलना में वुड टाइप ज़्यादा उपयोगी होता था। यह हल्का भी था और बड़े आकार में बनाना आसान भी।

लकड़ी के टाइप ने प्रिंटरों को बड़े पैमानों पर काम करने की सुविधा दी। इस कारण रंग-बिरंगे अक्षरों की छपाई संभव हुई, जहाँ एक ही डिज़ाइन को अलग-अलग रंगों में छापा जाता था। इसी वजह से फ़िल्म पोस्टर और सड़क पर लगने वाले नोटिस और आकर्षित बन गए।

एम्परसैंड आउटलाइन और फिल, बारह लाइन, लगभग पाँच इंच बड़ा। हैरिल्ड ऐंड सन्स’ न्यू ऐंड एब्रिज्ड स्पेसिमेन्स ऑफ वुड-लेटर, कॉर्नर्स, बॉर्डर्स, एंड सेटर्रा. हैरिल्ड ऐंड सन्स द्वारा निर्मित, १८९० का दशक।

वुड टाइप का उपयोग अक्सर क्रोमैटिक प्रिंट बनाने के लिए किया जाता था, यानी ऐसे प्रिंट जिनमें कई रंग परत दर परत छापे जाते थे। हर रंग के लिए अलग वुड टाइप या ब्लॉक इस्तेमाल होता था, जिसे सावधानी से मिलाया जाता था ताकि सभी रंग ठीक तरह से एक साथ बैठें।

टाइपोग्राफी में वुड टाइप ने मोटे और सजावटी अक्षरों को लोकप्रिय बनाया। इनका प्रभाव आज के पोस्टर और डिस्प्ले टाइप में भी देखा जा सकता है।

इस सलोन को देखें, जहाँ आर्काइव के एसोसिएट क्यूरेटर और संपादकीय निदेशक स्टीफन कोल्स आर्काइव में वुड टाइप स्पेसिमेन के संग्रह को प्रस्तुत करते हैं। रंग-बिरंगे क्रोमैटिक नमूनों से लेकर अनोखे और दिलचस्प उदाहरणों तक, वे यह भी बताते हैं कि पिछले दो सदियों में वुड टाइप का उपयोग कैसे हुआ और समय-समय पर उसे फिर से कैसे जीवित किया गया। अगर आप भारतीय वुड टाइप के कुछ उद्धाहरण देखना चाहते हैं तो फिर डायमंड वुड टाइप वर्क्स के कुछ स्पेसिमेंस भी लेटरफ़ॉर्म आर्काइव के यहाँ मिलेंगे।

विलियम एडिसन ड्विगिन्स

विलियम एडिसन ड्विगिन्स की किताब लेआउट इन एडवरटाइज़िंग का कवर।
विलियम एडिसन ड्विगिन्स की किताब लेआउट इन एडवरटाइज़िंग का कवर।

विलियम एडिसन ड्विगिन्स एक बहुत प्रभावशाली अमेरिकी डिज़ाइनर थे, जिन्हें ग्राफ़िक डिज़ाइन, टाइपोग्राफ़ी और टाइप डिज़ाइन के अग्रदूतों में माना जाता है। उन्होंने केवल टाइपफेस ही नहीं बनाए, बल्कि डिज़ाइन के बारे में सोचने का तरीका भी बदला।

ड्विगिन्स ने अपने करियर की शुरुआत शिकागो में विज्ञापन और लेटरिंग के क्षेत्र में काम करते हुए की। उन्होंने लेटरिंग कलाकार के रूप में ख्याति प्राप्त की और ग्राफ़िक कला पर बहुत कुछ लिखा। उनकी पुस्तक " लेआउट इन एडवरटाइज़िंग "(Layout in Advertising) आज भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ मानी जाती है।

ड्विगिन्स को “ग्राफ़िक डिज़ाइन” शब्द को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी दिया जाता है। उन्होंने किताबों के डिज़ाइन, मुद्रण, सुलेख, चित्रण और यहाँ तक कि मंच डिज़ाइन में भी काम किया। उनका मानना था कि डिज़ाइन केवल सजावट नहीं, बल्कि एक सोच-समझ कर किया जाने वाला अनुशासित शिल्प है।

उनके बनाए टाइपफेस, जैसे इलेक्ट्रा, आज भी अपनी स्पष्टता और पठनीयता के लिए जाने जाते हैं। ड्विगिन्स छोटे-से-छोटे विवरण पर ध्यान देते थे, चाहे वह स्पेसिंग हो, लेआउट हो या अक्षरों के रूपों का संतुलन।

उनके काम को पढ़ते और देखते समय कई बार भारतीय टाइप डिज़ाइनर आर. के. जोशी की याद भी आती है। उनके बारे में और जानने के लिए ब्रूस केनेट के यह ब्लॉग पोस्ट या वीडियो भी देख सकते हैं ।

एमिग्रे

एमिग्रे पत्रिका के सभी अंक और अन्य सामग्री अब ऑनलाइन आर्काइव में उपलब्ध हैं।
स्टूडियो प्रवेश संकेत, शीट मेटल पर मैग्नेट से बना हुआ, १९८७।
स्टूडियो प्रवेश संकेत,शीट मेटल पर मैग्नेट से बना हुआ, १९८७।

एमिग्रे पत्रिका अपने ज़माने की एक प्रयोगवादी डिज़ाइन पत्रिका थी, जिसने १९८०-९० के दशक में ग्राफ़िक डिज़ाइन की दुनिया को गहराई से प्रभावित किया। इसकी शुरुआत रूडी वेंडरलैन्स और ज़ुजाना लिचको ने की थी, उस समय जब कंप्यूटर और डिजिटल प्रकाशन तकनीकें अभी-अभी डिज़ाइन स्टूडियो में प्रवेश कर रही थीं।

यह केवल एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि एक मंच था जहाँ टाइपोग्राफ़ी, डिज़ाइन, कला, संस्कृति और तकनीक पर नए सवाल उठाए जाते थे। एमिग्रे ने जानबूझकर “परफ़ेक्ट” डिज़ाइन से अलग राह चुनी और खुरदरे, भावपूर्ण टाइपफेस को बढ़ावा दिया जो देखने में कंप्यूटर पर बने हुए लगते थे।

ज़ुजाना लिचको के बनाए टाइपफेस, जैसे मिसेज़ ईव्स और ऑकलैंड, ने यह दिखाया कि पठनीयता के कोई स्थायी नियम नहीं होते। यह संदर्भ और उपयोग के साथ बनती है।

पत्रिका के लेख अक्सर बहस, साक्षात्कार और मज़बूत विचारों से भरे होते थे, जो डिज़ाइनरों को केवल देखने नहीं बल्कि सोचने के लिए भी प्रेरित करते थे। एमिग्रे ने दिखाया कि टाइपोग्राफ़ी केवल रूप नहीं, बल्कि विचारों को व्यक्त करने का माध्यम भी बन सकती है।

आज एमिग्रे को डिजिटल टाइपोग्राफ़ी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, जहाँ डिज़ाइन के नियमों का पालन करने के बजाय उन्हें चुनौती दी और नई संभावनाएँ खोलीं।

जस्टिस फ़ॉर मोना

यह पोस्टर मिस्री डिज़ाइनर ज़ंज़ीर ने बनाया है। वे २०११ की इजिप्ट की क्रांति के बाद विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए। इस आंदोलन को २५ जनवरी की क्रांति भी कहा जाता है। उस समय लाखों लोग सड़कों पर उतरे और तत्कालीन मिस्री राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को हटाने की माँग की।

यह पोस्टर उस श्रृंखला का हिस्सा था जिसका अंग्रेज़ी शीर्षक था “ऑफ़ कोर्स द आर्मी प्रोटेक्टेड थे रेवोल्यूशन ”(Of Course The Army Protected The Revolution ) मतलब "बेशक! सेना ने क्रांति की रक्षा की"।इस श्रृंखला में चार ऐसे लोगों को दिखाया गया था जिन पर पुलिस द्वारा अत्याचार किया गया था। इनमें से एक थीं मोना एल्तहावी, जो पत्रकार, लेखिका और महिला अधिकारों की प्रमुख आवाज़ थीं।

काहिरा में सुरक्षा बलों ने मोना पर हमला किया और उन्हें आंतरिक मंत्रालय में बंद कर दिया। उनकी रिहाई के लिए लोगों ने ज़ोरदार आवाज़ उठाई, और यह पोस्टर उसी विरोध का एक हिस्सा बना।

“जब अन्याय कानून बन जाता है, तो विद्रोह कर्तव्य बन जाता है।” यह पोस्टर पर लिखे अरबी पाठ का हिंदी अनुवाद है। यह वाक्य अरबी में स्प्रे पेंट से लिखा गया है, जो कूफ़िक लिपि के स्टेंसिल से बनाया गया है। अंग्रेज़ी अक्षरों की शैली इस्लामी सजावटी रूपों की याद दिलाती है।कूफ़िक लिपि की पहचान उसकी सीधी और चौकोर रेखाओं से होती है। इसमें छोटी सीधी रेखाएँ और लंबी आड़ी रेखाएँ प्रमुख होती हैं। इस लिपि को दसवीं शताब्दी में इब्न मुक़्लह ने व्यवस्थित रूप दिया था। लगभग तीन सौ वर्षों तक क़ुरआन इसी लिपि में लिखा जाता रहा।

पोस्टर के अक्षर मोना के चेहरे को ढँकते हुए दिखाई देते हैं, मानो विरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही हो। ज़ंज़ीर का काम अक्सर शहरी ज़िम्मेदारी और सामाजिक न्याय जैसे विषयों से जुड़ा रहता है। उन्होंने एस. सी. ए. इफ़. यानी सेना की उस परिषद की भी खुलकर आलोचना की जो मुबारक के हटने के बाद देश का शासन चला रही थी।

풀 (ग्रास)

अंत में एक सुंदर आर्टिस्ट बुक का उल्लेख करना आवश्यक है। यह काम ज़ियानलू यी का है। उनका जन्म कोरिया में हुआ और उनका पालन-पोषण चीन में हुआ। इस पुस्तक का नाम “풀 (घास)” है, जिसे २०१९ में डाट्ज़ प्रेस ने प्रकाशित किया था। यह समकालीन कोरियाई साहित्य को देखने का एक अनोखा दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

इस पुस्तक में केवल १२ पन्ने हैं, लेकिन इसमें किम सु-योंग की कविता 풀 (घास) के अंशों को बहुत सुंदर तरीके से जोड़ा गया है। यही कविता ज़ियानलू यी को पहली बार तब मिली थी जब वे कोरियाई भाषा विद्यालय में पढ़ रहे थे।

यह पुस्तक पारंपरिक पुस्तक निर्माण से आगे जाती है। इसमें काग़ज़ और लकड़ी को मिलाकर संरचना बनाई गई है। यह सीमित संस्करण है और इसकी केवल पचास प्रतियाँ प्रकाशित हुईं, जिनमें कोरियाई और अंग्रेज़ी दोनों भाषाएँ शामिल हैं।

इसके डिज़ाइन में अकॉर्डियन बाइंडिंग और पॉप-अप संरचना का उपयोग किया गया है। जैसे-जैसे पन्ने पलटते हैं, काग़ज़ की संरचना ऊपर उठती है और फैलती है, जैसे घास का एक मैदान खुल रहा हो। उसी के बीच कविता के शब्द सहज रूप से बहते हुए दिखाई देते हैं।

यह पुस्तक केवल देखने में सुंदर नहीं है। यह अनुवाद की भूमिका पर भी विचार करने के लिए प्रेरित करती है। इसमें एक कविता शब्दों से आगे बढ़कर एक वस्तु का रूप ले लेती है। इस तरह यह भावनाओं को एक भौतिक रूप में पकड़ती है और भाषा और कला के गहरे संबंधों पर सोचने का अवसर देती है।

इन उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि अक्षरों की दुनिया केवल लिखने-पढ़ने का ज़रिया नहीं है, बल्कि इतिहास, संस्कृति, तकनीक और विचारों से गहराई से जुड़ी हुई है। अलग-अलग समय, जगह और माध्यमों में अक्षरों ने नए रूप धारण किए हैं और अपने साथ उन समाजों की कहानियाँ भी लेकर आए हैं जिनमें वे बने।

लेटरफॉर्म आर्काइव का उद्देश्य इसी विविधता को सबके सामने लाना है। संग्रह की इन वस्तुओं के ज़रिये यह प्रयास है कि अधिक से अधिक लोग अक्षरों, टाइपोग्राफ़ी और डिज़ाइन की दुनिया को करीब से देख सकें, समझ सकें और उनसे नए संवाद शुरू कर सकें। इस लेख की शुरुआत एक ऑनलाइन दौरे से हुआ और इसकी तैयारी में कई स्रोतों से जानकारी एकत्र की गई है, लेकिन इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान हमारे डोसेंट समूह का रहा है। हम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं और अपनी-अपनी भाषाओं और ज्ञान को साथ में बाँटकर टूर तैयार करते हैं। इसी साझा प्रक्रिया के माध्यम से कई ऐसी बातें सामने आईं, जो संग्रह से जुड़ी टिप्पणियों और चर्चाओं से विकसित हुई हैं। जैसे अफ़्रीका से जुड़े दोनों वस्तुओं के बारे में जानकारी भी डीना बेन रहीम ऑडी और सबीहा बसराई जैसे शोधकर्ताओं और डोसेंट के काम के कारण संभव हो पाई।

यदि आप चाहें, तो आप भी इस संग्रह का ऑनलाइन दौरा कर सकते हैं। आप दुनिया में कहीं भी हों, लेटरफॉर्म आर्काइव कई भाषाओं में व्यक्तिगत और ऑनलाइन टूर उपलब्ध कराता है।

टॉन्या जॉर्ज एक स्वतंत्र डिज़ाइनर और शोधकर्ता हैं, जिनका कार्य टाइपोग्राफी और टाइप डिज़ाइन पर केंद्रित है। उन्हें विभिन्न भारतीय लिपियों में टाइपफेस और आइडेंटिटी डिज़ाइन विकसित करने का अनुभव है और वे कलात्मक परियोजनाओं पर भी काम करती हैं। उन्होंने कई कॉलेजों में टाइप डिज़ाइन पढ़ाया है और भारतीय अक्षर-रूपों से जुड़ी सांस्कृतिक व ऐतिहासिक कहानियों पर शोध और लेखन किया है, जो टाइपोग्राफ़िका और फ़ॉन्टस्टैंड न्यूज़ जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है। वह लेटरफॉर्म आर्काइव की भारत संवाददाता हैं, वर्चुअल गाइडेड टूर संचालित करती हैं।

Acknowledgements

मैं प्रणवी चोपड़ा की आभारी हूं, जिन्होंने मेरे पहले हिंदी लेख की प्रूफरीडिंग की। में अपने साथी डोसेंट्स को भी शुक्रिया अदा कराना चाहती हूँ, जिन्होंने निरंतर सहयोग और ज्ञान बाँटकर विभिन्न देशों की लेखन शैलियों को और अधिक रोचक बनाया।